Raj Ashok 21 Jul 2024 कविताएँ हास्य-व्यंग अभी बसंत है।। 33093 0 Hindi :: हिंदी
बसंत बहार की न जाने क्यों हर साल ये हजारों फुल खिलाती है ।। पेड़ो की हरी-हरी टहनियों पर भंवरों को बुलाती है ।। ये आदत इस की या कोई शौक है ।। नित नई - नवेली रंगरलियों से बागवां की टहनियां फिर हरी-भरी हो जाती है ।। ये परिवर्तन जीवन में किसी सिख से कम नहीं.....! सुर्खियों में अभी बसंत है । हम नहीं .......?