संदीप कुमार सिंह 29 Aug 2024 कविताएँ समाजिक मेरे ये दोहे समाज हित में है. जिसे पढ़कर पाठक गण अवश्य ही लाभान्वित होंगें. 28768 0 Hindi :: हिंदी
सुख दुख तेरे हाथ हैं, जग के सिरजनहार। आप चला जैसा रहे, चलता है संसार।। सुख दुख तेरे हाथ हैं, जग के तारणहार। मेरी ग़लती माफ़ कर, करिए कृपा अपार।। ईश्वर तेरे हाथ में, इस जीवन का खेल। भारी दुख आते कभी, डालें नाक नकेल।। ईश्वर लीला नित करें, जिसकी टेड़ी खीर। काल जाल की आप ही, काट रहे जंजीर।। पुण्य कर्म करते रहो, कहते संत सुजान। भाव भक्ति में डूबिए, खुश रहते भगवान।। भाग्य भरोसे बैठ मत ,सुख दुख तेरे हाथ। कर्मों के आधीन ही, फल देते रघुनाथ।। सुख-दुख तेरे हाथ में, नहीं किसी का दोष। मेहनत का जो फल मिले, उसमें कर संतोष।। कर्म भाग्य दोनों प्रबल, कहते तुलसीदास। सुख दुख तेरे हाथ में, फिर क्यों रहे उदास।। सुख दुख तेरे हाथ है, रहता क्यों हलकान। बोता जैसा बीज है,काटे फसल किसान।। बोए पेड़ बबूल के ,खोज रहे हो आम। सुख-दुख जो है सामने, कर्मों के अंजाम।। मनमानी किसकी चली , होती बुद्धि मलीन। अहंकार वश आदमी , कब रहता शालीन।। मनमानी किसकी चली, खोए बुद्धि-विवेक। इधर-उधर भटके मनुज , चले न रस्ता नेक।। मनमानी किसकी चली, कब समझे इन्सान। इच्छाओं के दास सब , भूल गए भगवान।। मनमानी किसकी चली , होता इक दिन अंत। विधि का यही विधान है, कहते साधू-संत।। मनमानी किसकी चली , दर्प न करना मित्र। इससे होता है हनन, जीवन-भाग्य-चरित्र।। अपनों के ही बीच में, छिड़ी जंग है आज। खून खराबा कर रहे, रहते गर्म मिजाज।। अपनों के ही बीच में,नोंक झोंक हर बार। खूब पनपता प्यार है ,अपने ही परिवार ।। अपनों के ही बीच में, रहता प्रेम अटूट। दुश्मन जलकर डालते,अपने घर में फूट।। अपनों के ही बीच में,रहते हैं अनजान। आयें काम न कष्ट में,कर देते प्रस्थान।। होते हैं मतभेद भी, अपनों के ही बीच। मुखिया राह निकालता, नहीं मचाये कीच।। मनमानी किसकी चली , होती बुद्धि मलीन। अहंकार वश आदमी , कब रहता शालीन।। मनमानी किसकी चली, खोए बुद्धि-विवेक। इधर-उधर भटके मनुज , चले न रस्ता नेक।। मनमानी किसकी चली, कब समझे इन्सान। इच्छाओं के दास सब , भूल गए भगवान।। मनमानी किसकी चली , होता इक दिन अंत। विधि का यही विधान है, कहते साधू-संत।। मनमानी किसकी चली , दर्प न करना मित्र। इससे होता है हनन, जीवन-भाग्य-चरित्र।।
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....