Hemraj suman 19 Jun 2025 कविताएँ समाजिक अवनी, आन, शान, माता, बारूद, योद्धा, परमपिता, परमाणु हथियार, मंदिर, मस्जिद, शिक्षा, 23187 1 5 Hindi :: हिंदी
मेरा मन विचलित है देखो ये कैसा सम्मान है। कोई पुकारे माता मुझको कोई कहे मेरी आन है। कोई समझता मुझको धरोहर की ये तो मेरी जान है। पर सच से सब कतराते है क्या ये भी इंसान है। मेरा मन विचलित है,,,,,,,,,, मुझको समझना आया नहीं है मेरी ही संतानों को। भारी मन है मेरा पर किसे सुनाऊं दुख के इन गानों को। मैं रोती हूं, ना सोती हूं बस यही कामना मन में है कि कभी समझ आ जाए मेरे प्यारे से शैतानों को। मेरा मन विचलित है,,,,,,,,,, योद्धा बनकर झगड़ रहे है मानो ये सब पागल है। इनके अस्त्र और शस्त्र से मेरा आंचल ही तो घायल है। मन में कुंठा भरी हुई है किनको पाला पोसा है कभी जो झनका करती थी बिलख रही वो पायल है। मेरा मन विचलित है,,,,,,,,,, अपनी जिद पर अड़े हुए है। बारूद लेकर खड़े हुए है। क्या पाना है तुमको इस भौतिकता के आनंद में नीचे देखो कदमों में लाशों के अंबार पड़े है। मेरा मन विचलित है,,,,,,,,,, ये भी तुम्हारे भाई है बस किस्मत ही हरजाई है समझ न पाए तुम जो सीख पिता ने सिखलाई है उनको भी तो बांटा तुमने मंदिर और मस्जिदों में कैद कर लिया अपने पिता को ये कैसी शिक्षा पाई है। मेरा मन विचलित है,,,,,,,,,, जिसने रचा ब्रह्माण्ड को वो परमपिता तो एक है। संतानों की रचना की वो सब तुम एक से एक है। तेरे पिता की शक्ति निहित है मेरे भी इस कण कण में जो फल देगा सर्वनाश का वो बम परमाणु भी एक है। मेरा मन विचलित है,,,,,,,,,, अवनी हु मैं अवनी बिलख रही हु देख कर। मेरे बच्चे नाव चलाना चाहते है बस रेत पर। नया सवेरा आयेगा तो फिर से खुश हो जाऊंगी। फिर से मैं जी जाऊंगी बच्चों की एकता देख कर।। मेरा मन विचलित है,,,,,,,, हेमराज सुमन
11 months ago