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बदलते मानव

Ramu kumar 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक Badlta Insaan 79137 0 Hindi :: हिंदी

चिंता की चिता सजा करके!
अंदर ही अंदर जलते हो!!

औरों की खुशी में जहर मिलाकर !

सोने का कफन पहनते हो !!

         मुस्कान भरे चेहरे को लेकर!

          हाट बाजार टहलते हो!!

           निर्धन काया से भी अक्सर!

           उल्टी बाजी चलते हो!!

                          औरों के खुशी मे....२

भोजन में जहर मिला करके!

इधर उधर से ठगते हो!!

कहते हो इसमें अच्छा गुण है!

कह कर इतना चलते हो!!

                       औरों के खुशी में....२

माथे पे तिलक लगाकर के!

मुख से जहर उगलते हो!!

तामसी भोजन रातों में!

सुबह हाथ चंदन से मलते हो!!

                      औरों के खुशी में....२

कहते हो निश्चल मानव हूं!

औरों के खुशी से जलते हो!!

गीता पे हाथ रख कर के!

पैसों से बात बदलते हो!!

                     औरों के खुशी में ....२

पुज्य मंदिरों में जाकर के!

झूठी तान परस्ते हो!!

हर पहलू में सिर हिला कर!

गिरगिट सा रंग बदलते हो!!

                   कहते हो निश्चल मानव हूं!

                    मानव से ही जलते हो !!

औरों के खुशी में जहर मिलाकर!

सोने का कफन पहनते हो!!

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