संदीप कुमार सिंह 03 Jul 2026 कविताएँ समाजिक मेरी यह नई सामाजिक कविता आपको सच्चाई से रू-ब-रू कराएगी. 3137 0 Hindi :: हिंदी
उसका कोई रूप नहीं है, बेच दिया ईमान । खाना पीना मस्ती करना,खोले व्यर्थ जुबान । काबू मन पर रहा नहीं है,रहा नहीं है फर्ज- जैसे बिन पेंदी का लोटा,खुद से हो अंजान ।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह*Author*
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....