Raj Ashok 22 Jul 2024 कविताएँ समाजिक भीष्म प्रतिज्ञा 34870 0 Hindi :: हिंदी
भीष्म तेरी प्रतिज्ञा क्या.....? तेरी गौरवगाथा के काम आई मृत्यूस्या पर लेटे-लेटे प्रायश्चित के आंसू ....से शन्न था हृदय जीवन में क्यों प्रण लिया। एक हट और वचनबद्धता में जीवन बीत गया। सत्य से विचलित हुआ है । क्या कभी सनातन अगर कोई प्रण न होता तो कुरूक्षेत्र में आज महाभारत सा रण न होता । ये जीवन मौन व्रत के लिए नहीं कर्म प्रधान है। हार -जीत नहीं रण का मैदान है । रण मे निशस्त्र हुऐ देख शिखंडी को सभा में मोन हुऐ देख निर्वस्त्र नारी को वो चीरहरण की घीकार - चित्कार आत्म -सम्मान पे चोट थी । आज भी भीष्म पितामह -मह मौन है । हो रहा चीरहरण यूंही समाज में न जाने किस प्रतिज्ञा में कौन है ।