संदीप कुमार सिंह 11 Oct 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 28334 0 Hindi :: हिंदी
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" एक जरा सी भूल से,भारी हो नुकसान। और व्यर्थ चिन्ता रहे,जाते घट है मान।। एक जरा सी भूल ने,ले ली उसकी जान। सखियों में ही मस्त हो,उलझ गया तब ध्यान।। एक जरा सी भूल हो,कर दूं मैं इजहार। उनको भी तो हो पता,मुझको उनसे प्यार।। एक जरा सी भूल की,रखें सर्वदा ध्यान। रखिए शांत दिमाग को,हो सब मेहरबान।। एक जरा सी भूल पर,फोरन करें विचार। फिर खुद करें सुधार तो,मिले सरस व्यवहार।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍️ जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....