संदीप कुमार सिंह 14 Oct 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 33771 0 Hindi :: हिंदी
धड़कन को एक सहारा मिल गया, उसकी एक नज़र पे मैं मर गया। जहां तन्हाई थी वहां कली आ गई, फिर मन का मौसम गमकीला हो गया। दिल में मोहब्बत ही मोहब्बत जगा, होठों पे उसका ही नाम रहने लगा। जाने उसकी नजर थी या जादू? एक अद्भुत मजा सा रहने लगा। उस से अपने प्यार को जाहिर किया, वो गुस्से में आ कर कुछ यूं बोली। प्यार जताने में इतना देर क्यों? मैं तो कब से इन्तजार में ही थी। दोनों के अरमान खिल गए, मुस्कान ही मुस्कान छा गई। जिन्दगी में एक तरंग आ गई, खुशियाँ ही खुशियाँ छा गई। दिन_रात उल्लास ही उल्लास, सारे दुख हो गए थे खल्लास। नई कल्पना हम कर रहे थे, फूलों के सेज पर हम सो रहे थे। दो जिस्म पर सांसे एक हो गई, दिल का बाजार रौनक हो गई। परिंदे भी हमें दुआ देने लगे, पराए भी बन गए थे अब सगे। चर्चाओं में हमारा जिक्र होता, नव युवक_युवती गर्व करते। गुलशन की खुशबू रहने लगी, अंदाज ही अपना निराला था। एक दीपक की आस, जीने का तरीका खास। इरादा बहुत ही प्रबल, परिवार अपना हो अव्वल। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍️ जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....