Danendra 01 Jul 2025 कविताएँ समाजिक 26657 0 Hindi :: हिंदी
क्यों समझते हो हमें सिर्फ़ औज़ार, क्या संविदा का मतलब है लाचार? जिस बिजली से जगमग है ये शहर, उसी रौशनी के पीछे है हमारा ज़हर। हमने जोड़े टूटे तार, बिना दस्तानों के, उतरें मौत के मुहाने पर, सरकारी बहानों के। कभी जले, कभी गिरे, कभी कटी साँसें, पर फाइलों में दर्ज नहीं हमारे शोषण के डोरे। जब सिस्टम बैठा तो हमसे पूछा गया, जब जान गई, तो कंधा भी न भेजा गया। हम संविदा है, इसलिए खून सस्ता है , वो रोटी भी महंगी है , जो आपके लिए अच्छा है । बीमारी आई तो दवा भी नसीब नहीं, सरकारी अस्पताल ने कहा—तुम ‘सरकारी’ हो ही नहीं। ना बीमा, ना स्थायी दर्जा, हम पर है भारी कर्जा । हम भी किसी माँ के बेटे हैं, हम भी बच्चों के सपने देखते हैं। हमारे घर भी इंतज़ार करते हैं चूल्हे, पर हम जलते हैं—कभी तार में, कभी तंत्र में। अब और नहीं! हम चुप थे, पर अब सवाल करेंगे, जिन्हें हमने रोशनी दी, उन्हें रोशन दिमाग देंगे। हमें हक़ चाहिए—खैरात नहीं, हम बिजली संविदा कर्मी हैं, कोई बेगार नहीं। अब वक्त हमें भी पहचाना जाए, हमारे भी अधिकारों का सूरज उगाया जाए । हम सविदा कर्मी हैं गुलाम नहीं , हमारे भी मेहनत को इज्जत दिलाया जाए । हमारे चुप्पी को कमज़ोरी न समझो, ये आग है—अब चिंगारी नहीं। या हक़ दो, या रास्ता छोड़ो, अब हम गुलाम नहीं—इंसान हैं । हम भी इंसान है