शरद भूषण मोंगरा 29 Jul 2026 कविताएँ धार्मिक आध्यात्मिक 3001 0 Hindi :: हिंदी
जहां तहां हथ जोड़ता, मनुष्य है अज्ञानी। स्वयं छोड़ मैं में पड़ा, बन रहा अभिमानी।। मंदिर ऐसे सज रहा, ज्यों व्यापार दुकान। पंडित जेबें में भर रहा, लूट रहा यजमान।। धर्म कर्म समझाए के कर रहा गोल गपोल। जन्म मरण का खाई के पेट कर लिया ढोल।। पंडित स्वयं भ्रमा हुआ, औरों को भरमाए। अवगुण खुद में हैं भरे, औरों के छुडवाए।। पता नहीं जग माया है कुछ भी नहीं अमर। 'ईश' छोड़ सब पुजवाता दिखा दिखाकर डर।। सत्य ईश का पता नहीं, जाने शेष महेश। जो सचखंड कि बात करै, उससे करता द्वेष।। मंदिर घर जब ईश का, ताला क्यों दिया ठोक। काहे उसके प्यारों पर, तुमने लगादी रोक।। जरा बताओ मालिक को, क्या कोई बांध सका। क्या ईश्वर मंदिर के ही, लिए बना है सखा? उसका दर सब के लिए, खुला हुआ हर रोज। जो कोई देखे प्रेम से, कर देता है मौज।। उसको नहिं चाहिए तेरे, तेल दिया बाती। लगन लगा ले उसका दर्शन, करले दिन राती।। उसका मंदिर नर्तन है, पर वो अगम अपार। छोड़ तु ऐसे मंदिर को, क्यूं फिरता बेकार।। सर्वोत्तम गुरु ज्ञान है, जाकर भीतर देख। सचखंड और सतनाम में, चलकर माथा टेक।। शरद भूषण मोंगरा