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जलने लगे अलाव अब ठंढ़ी चारों और

संदीप कुमार सिंह 29 Dec 2023 कविताएँ समाजिक How open to the account in sahity live forum? How published to the articles ? How to the learn articles write?How to the open saving account any bank ?How to the create short video?How to the open account in YouTube?How to the post video on YouTube? 44704 0 Hindi :: हिंदी

जलने लगे अलाव अब,ठंढ़ी चारों और।
थड़थड़ हैं तन कांपते, नहीं बंधते कौर।।

जलने लगे अलाव अब,अमृत तुल्य है आग।
बिना आग के जल नहीं,गाते सब यह राग।।

जलने लगे अलाव अब, शीत लहर है जोर।
 ओस भरा परिवेश है, डूब गया है भोर।।

जलने लगे अलाव अब, होते नहीं प्रभात।
रहे आग के पास सब, लम्बी होती रात।।

जलने लगे अलाव अब,इससे बचती जान।
त्राहि त्राहि सब लोग हैं,करें दया भगवान।।
(स्वरचित मौलिक)
संदीप कुमार सिंह✍🏼
जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार

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