Bablu Verma 28 May 2025 कविताएँ समाजिक Jati nhi kuch bhi hoti,best kavita,bablu verma kavita,bablu kavita,bablu allahabadi, bablu lakhimpuriya,kavita,lekhak University of Allahabad 20786 0 Hindi :: हिंदी
ये जाति नहीं कुछ भी होती, ये जाति नहीं कुछ भी होती। क्यो लड़ते हो इसको लेकर, जाति नही कुछ भी होती भेदभाव को छोड़ो तुम, सबको आपस मे जोड़ो तुम ये जाति नहीं कुछ भी होती, ये जाति नहीं कुछ भी होती। कहना चाहता हूँ मैं, इन जाती के गद्दारो से क्यो लड़वाते हो तुम इनको, जाति के बटवारो से ये जाति नहीं कुछ भी होती, ये जाति नहीं कुछ भी होती। सीता के उन राम से सीखो, राधा के उन श्याम से सीखो क्षत्रिय बनकर वो आए हैं, ग्वाला बनकर भी आए हैं ये जाति नहीं कुछ भी होती, ये जाति नहीं कुछ भी होती। क्षत्रिय थे वो सबरी के जूँठे बेरो को खाया है, राम ने हमे सिखाया है ये जाति नहीं कुछ भी होती, ये जाति नहीं कुछ भी होती। प्रकृति भी हमसे कहती, भेदभाव न करती है हवा की पावन धारा, सबके तन को छूती है। ये जाति नहीं कुछ भी होती, ये जाति नहीं कुछ भी होती। नदियों का वो बहता पानी, झरने का वो मीठा पानी सबकी प्यास बुझाता है, जाति नहीं बतलाता है। कब समझोगे तुम इसको, सभी ने यही सिखाया है ये जाति नहीं कुछ भी होती, ये जाति नहीं कुछ भी होती।