संदीप कुमार सिंह 01 Sep 2026 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज को आगे बढ़ाने व समाज में व्याप्त अंधविश्वास को दूर कर समाज में आपसी प्यार को बढ़ाते हुए प्रगति की ओर ले जाएगी. 133 0 Hindi :: हिंदी
प्रीति है इस जहाँ से प्रेम और श्रद्धा भी है निर्मल हृदय मचल_ मचल कह रहा है थोड़ा और जीने दे मुझे l सुन्दर चरित्र और भारत वर्ष का इतिहास गौरवान्वित करने दे मुझे चारों ओर फैला गहरा अंधविश्वास और लज्जा जनक धारनाओं को दूर करने दे मुझे थोड़ा और जीने दे मुझे l कर्तव्य है हम सबों का सुसज्जित और सम्मानित राष्ट्र निर्माण का दुष्ट और निर्लज्जों को कठोर और दृढ़ प्रचंड दण्ड देने का l थोड़ा और जीने दे मुझे l इरादा मजबूत और मोहब्बत का पैगाम स्वाभिमान और प्रगति का सैलाब फैलाने दे मुझे थोड़ा और जीने दे मुझे l यथा योग्य व्यवहार और सुरक्षित जीवन सुन्दर देश अपना इसमें उत्साह भरे स्वर भरने दे मुझे थोड़ा और जीने मुझे l कठिनाइयों बधाओं और प्रलोभनों से लड़ने दे मुझे दृढ़ संकल्प और आत्मबल से बढ़ने दे मुझे थोड़ा और जीने दे मुझे l देश के कोने_कोने में सभ्य और भद्र जनगण में यह भावना फैलाने दे मुझे थोड़ा और जीने दे मुझे ll (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह*Author*
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....