संदीप कुमार सिंह 21 Jun 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 37255 0 Hindi :: हिंदी
मौसम अब बदल कर बेकार होता जा रहा, चारों तरफ मौत का अंधकार होता जा रहा। बिना जरूरत के ही बरसात आ रही है, बेमतलब रोग_विकार बढ़ता जा रहा है। धनिकों का तो सदा ही बहार ही रहता है, मध्यम और गरीब पाटों के बीच पीसा रहें हैं। परेशानियां_बाधाएं को जरा भी ख्याल नहीं, लोगों के जान का तनिक भी अहसास नहीं। मानसिकता का ह्रास कर दिया है यह समय, कुंठित बनाने की प्रक्रिया तेजी से चलता है। खैर सांस_सांस से आस को बांधे रखना है, हौसला के उड़ान को नित गति देते रहना है। इरादा मजबूत चट्टानी जिगर को बनाए रखना, प्रयास की परक्रिया को करते ही है रहना। आए हैं इस हसीन धरा पर तो जी भरकर है जीना, आनंदों के महासागर में खुशियों का गोता है लगाना। सादगी के दीए को सदा जलाए ही रखना, स्वच्छता भरा अरमान जगाए ही रखना। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....