संदीप कुमार सिंह 02 Jul 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 33829 0 Hindi :: हिंदी
( मुक्तक छंद ) जीवन के अब यार क्यों, बिगड़ गए सुर ताल। आओ कुछ मंथन करें,करिए खत्म बवाल। महँगाई की मार से,कमर गई है टूट_ खोए अपने में सभी,बढ़ा लिए जंजाल।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍🏼 जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....