संदीप कुमार सिंह 25 Jul 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 25360 5 5 Hindi :: हिंदी
(दोहा छंद) कागा मोती चुग रहे,साँप बना है दोस्त। समय समय का फेर है,खाते सब हैं गोस्त।। कागा मोती चुग रहे,मैना खाए दाल। चले जमाना भूल में,जीवन है बदहाल।। कागा मोती चुग रहे,ओढ़े सभी नकाब। और विश्वास अब नहीं,जगत हुई बेआब।। कागा मोती चुग रहे,दाना खाए हंस। उलटा अब संसार है,मामा बहु अब कंस।। कागा मोती चुग रहे,हैरत में है जान। साधु बना शैतान है,संकट में है आन।। कागा मोती चुग रहे,बेमानी संसार। हंस मुसीबत में फॅ॑से,प्रभु से करें गुहार।। कागा मोती चुग रहे,हंस हुए बीमार। दुर्दिन में रक्षा करो,आ जाओ करतार।। कागा मोती चुग रहे,खूब बजाते गाल। कॉ॑व कॉ॑व करते फिरें,बड़ा बुरा है हाल।। कागा मोती चुग रहे,करें नहीं है काज। दाना तिनका हंस को,कागा करते राज।। कागा मोती चुग रहे,करें हंस पर राज। कलयुग का यह दृश्य है, जाने सकल समाज।। क्षुधा सहें कलकंठ अब,हंस आज मजबूर। कागा मोती चुग रहे, बदल गया दस्तूर।। गीदड़ भभकी से डरे,सिंह हुए अब मौन। कागा मोती चुग रहे,देश बचाए कौन।। कलियुग के इस दौर में, भूखों मरें मराल। कागा मोती चुग रहे, गिरगिट करें धमाल।। चोर यहाँ रक्षक बने, मूर्ख बाँटते ज्ञान। कागा मोती चुग रहे, गधे छेड़ते तान।। चाटुकारिता चरम पर,चमचे सबके खास। कागा मोती चुग रहे,हंस करें उपवास॥ निष्ठा पर निगरानियाँ,धोखा गहना आज। कागा मोती चुग रहे,बनकर तिकड़मबाज।। कागा मोती चुग रहे,हंस मीजता हाथ। कठिन काल देता नहीं,जग में कोई साथ।। कागा मोती चुग रहे,आया कैसा काल। मुर्ख राज सुख भोगता,वुद्ध खड़ा बेहाल।। कागा मोती चुग रहे,आया कैसा काल। हंस सभी बेचैन हैं, बहुत बुरा है हाल।। कागा मोती चुग रहे,हंस चुग रहे घास। ये कैसे दिन आ गए,दुष्ट बन गए खास।। कागा मोती चुग रहे, ये कैसा है न्याय। हे प्रभु तुम कुछ तो करो,हे कृपालु सुखदाय।। कागा मोती चुग रहे,हंस करे श्रम चूर। कलयुग का कर सामना,कागा है मगरूर। दाना तिनका चुन रहा,हंस अकेला दूर। कागा मोती चुग रहे,समय बहुत है क्रूर। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍️ जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार
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I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....