Avnish Dutt 07 May 2026 कविताएँ दुःखद Dukh, poem for struggle, sacrifice, poem for sacrifice, tyag k liye kavita, tyag ki kavita 9242 0 Hindi :: हिंदी
कभी-कभी रुक जाया कर कभी-कभी रुक जाया कर, अपने आप को इतना न थकाया कर, हिम्मत तेरी बंधी रहे, अपने आप को इतना न आज़माया कर।। अँखियों से नीर नहीं बहने देता, व्यथा न पता चले तेरी, ऐसा कोई निशान भी नहीं रहने देता।। तेरी ये अदा भी बड़ी अजीब है, जो तुझे समझते भी नहीं, तू उनका भी नसीब है।। पास तेरे देने को कुछ भी न हो शायद अभी पर तू सबका यक़ीन है।। इसीलिए तो कहता हूँ, कभी-कभी रुक जाया कर, अपने आपको इतना न थकाया कर।। हर ग़म को तू कैसे रोक लेता है, गहरे से गहरे ज़ख्म को भी कैसे सोख लेता है, दर्द तो तुझे भी होता होगा, हर क्रोध को तू कैसे ढोता होगा।। तेरे जैसे कम आते हैं इस धरा पर, अपनी जान ऐसे न लगाया कर दाँव पर, बहुत नहीं तो, थोड़ी देर ही सही, थोड़ा तो थम जाया कर, अपने आपको इतना न थकाया कर।। दुःख में तू रोता नहीं है, सुख में आपा खोता नहीं है, तेरा जज़्बा कुछ तो अजीब है, शायद इसलिए तू सबका यक़ीन है।। यूँ ही नहीं कहता हूँ, थोड़ा तो रुक जाया कर, अपने आपको इतना न थकाया कर।। अवनीश दत्त