संदीप कुमार सिंह 30 Sep 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 28776 0 Hindi :: हिंदी
(दोहा छंद) कल क्या हो किसको पता,रहो मजे में यार। कर ले उलफत आज से,खुशियाँ मिले अपार।। कल क्या हो किसको पता,मरता कभी न प्यार। जीवन को गुलजार कर,खुद से करें दुलार।। कल क्या हो किसको पता,झुमें मिलकर आज। करिए भला समाज का,बन जाएं सरताज।। कल क्या हो किसको पता,रखें आलस्य दूर। करें समय से काम हर,जीवन में हो नूर।। कल क्या हो किसको पता,कल पे मत रह यार। जो करना है आज कर,ध्यान रखे परिवार।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍️ जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....