MUSARRAT ALI 26 Mar 2025 कविताएँ दुःखद #ख़ामोश अल्फ़ाज़ 22976 1 5 Hindi :: हिंदी
सोचता हूं क्या लिखूं, ना झरनों में वादें हैं ना नदियों में कोई धारा सोचता हूं क्या लिखूं ना साहिल पे कश्ती है ना समंदर में किनारा। सोचता हूं क्या लिखूं, ना शहर में बस्ती है ना कोई मुसाफ़िरख़ाना सोचता हूं क्या लिखूं ना ख़्वाब है आंखों में ना जग में कोई ठिकाना । सोचता हूं क्या लिखूं, ना दरख़्त साए है ना पेड़ आशियाना सोचता हूं क्या लिखूं ना राही को मिली डगर ना कुदरती ख़ज़ाना सोचता हूं क्या लिखूं, ना हमे मिला ख़ुदा ना देखा कोई ज़माना सोचता हूं क्या लिखूं ना चाह है मंज़िल की ना जहां कोई बसाना।
1 year ago