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कुर्सी

Rambriksh Bahadurpuri 31 Mar 2026 कविताएँ समाजिक #रामवृक्ष बहादुरपुरी#कुर्सी#नेता#भ्रष्टाचार#कविता 9499 0 Hindi :: हिंदी

कुर्सी 

आज की कुर्सियाॅं
चारो पाॅंव जमाए घूम जाती हैं 
बिना पेंदी के लोटे सा,
बैठने वाला भी बैठे बैठे 
दुनिया घूम लेता है,
फिर,
कौन चाहेगा छोड़ना?
अधिकारी हो या नेता,
आमदनी का स्रोत
चरित्र का खोट
जनता पर चोट
यहीं से करना भी आसान है,
यह गाॅंव घर घराने की
सामान्य कुर्सी थोड़ी है 
जो आव भगत के लिए 
सस्ते में फेरी वाले से 
खरीद ली गई हो,
इसकी कीमत 
जनता अपने खून पसीने
भूखमरी दर्द और पीड़ा से चुकाती है 
इसीलिए 
यह कुर्सी अपनी रुतबा दिखाती है। 
     

    रामवृक्ष बहादुरपुरी 
अम्बेडकरनगर उत्तर प्रदेश

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