Anilkumar Rathwa (Sameer) 15 Aug 2025 कविताएँ अन्य "माँ का ऋण" 27075 1 5 Hindi :: हिंदी
हे… माँ, मुझे माफ़ करना,
मैं तेरे आँचल की छाँव का
पूरा हिसाब कभी नहीं लिख पाया।
तेरी नींद बेचकर जो सपने
मेरी आँखों में डाले थे,
उनका ब्याज भी मैं लौटा नहीं सका।
तेरी हथेलियों की गर्मी
मेरे जीवन की रोटी बनी,
पर मैंने कभी तुझसे पूछा ही नहीं
कि तूने कब खाना खाया।
माँ…
तूने मुझे गिरते देखा,
और खुद ठोकर खाई—
ताकि मैं बच जाऊँ।
मैंने दुनिया कमा ली,
पर तेरे पैरों की मिट्टी
आज भी खाली है…
माँ, मुझे माफ़ करना,
तेरा ऋण मैं जन्मों में भी नहीं चुका पाऊँगा।
("माँ का उत्तर") :
बेटा…
ऋण?
माँ और बेटे के बीच
कोई हिसाब-किताब होता है क्या?
तूने पहली बार “माँ” कहा,
तभी मैंने अपना सारा जीवन
तेरे नाम कर दिया।
तूने चलना सीखा,
तो मेरी सारी थकान
तेरे पहले क़दमों में उतर गई।
मुझे रोटी नहीं चाहिए,
तेरे चेहरे की मुस्कान
मेरे लिए सबसे बड़ा भोज है।
बेटा…
तू खुश रह,
तू स्वस्थ रह,
यही मेरा पूरा ब्याज है।
ऋण चुकाने की बात मत कर,
माँ का ऋण तो वही चुका सकता है
जो अपनी माँ को वापस जनम दे दे—
और वो किसी के बस में नहीं।
11 months ago