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मन के भीतर का रावण

Himanshu chandra pandey 02 Oct 2025 कविताएँ समाजिक #vijaydashmi poem #dashera poem #ravan dahan poem 17014 0 Hindi :: हिंदी

आज विजयदशमी के अवसर पर 
बुराई पर अच्छाई की जीत के दिन पर 
लिखने बैठा जो कुछ अपने विचार 
पर एक विचार ने मन मे दी हुंकार 

त्रेता युग मे रावण का प्रभु ने अंत किया 
लेकिन रावण आज भी जीवित है 
आज के युग मे रावण एक सोच है 
ये सोच मनुष्यों के मन मे व्याप्त है 

समाज मे है रावण के रंग अनेक 
हर रोज उजागर होते इसके रूप अनेक 
आतंकवाद, चोरी-डकैती और भ्रष्टाचार
संसार मे मचा है जिसका हाहाकार 

राजनीति मे है भ्रष्टाचार 
कुछ नेता बिकने को हरदम है तैयार 
नेताओ की बोली लगती है 
विचारधारा शूली चढती है 

राम जैसा बनना नहीं है आसान 
यह तुलना है बेकार 
राम गुणों का है भंडार 
हर अवगुण से अनजान 

हमको ये सोचना चाहिए 
राम जैसा बनने के स्थान पर 
राम जैसी सोच, आचरण और संस्कार 
धारण करने का प्रयास करना चाहिए 

राम जैसा एक भी गुण हो जो मानव के भीतर 
समाज से रावण रूपी बुराई कम होगी शत प्रतिशत 
विजयदशमी के पावन पर्व मे रावण दहन के साथ 
मन के भीतर के रावण का भी दहन हो आज

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