संदीप कुमार सिंह 08 Oct 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 19126 0 Hindi :: हिंदी
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" मनमानी किसकी चली,नहीं किसी का यार। मनमानी वाले गए,खोकर सब अधिकार।। मनमानी किसकी चली,बड़े बड़े हो ढ़ेर। हर कुछ का है दायरा,माने जो वह शेर।। मनमानी किसकी चली,रावण थे अति वीर। लेकिन वह अभिमान में,खाया प्रभु का तीर।। मनमानी किसकी चली,चलता कभी न जोर। जगत प्यार से ही चले,छम छम नाचे मोर।। मनमानी किसकी चली,ऐसों को हो नाश। राजा से वह रंक हो,टूटे उसके आश।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍️ जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....