संदीप कुमार सिंह 07 Jul 2024 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है. मुझे आशा है कि मेरी यह कविता बढ़कर पाठक लोग अवश्य ही लाभान्वित होंगें. 31528 0 Hindi :: हिंदी
मानसून घनघोर गर्जन करते हुए, मोतियों की झालरों से सजे हुए, बादलों के मतवाले सवारी पर सवार, नभ में विद्युत की जगमगाहट के साथ, छम _ छम नाचते आया है मानसून। धुंआधार पानी बरसाता हुआ, ठाट _ बाट अनोखा आलीशान, मानसून पधारें हैं इन्द्रधनुष लिए, प्रकृति के अति प्रिय पात्र बनते हुए। चारों और खिली _ खिली है फुलवारी, वसुन्धरा हरी _ हरी परिधानों में सजी हुई, झूम रही है डाली _ डाली, पत्ते _ पत्ते ने ली है अंगड़ाई। फूल _ फूल पर यौवन है आया, निखर रही है सारी क्यारी_क्यारी, वन _ उपवन सारा खेले अठखेलियाँ, प्रणय _ प्रमोद करते हुए जीव सारा। प्रेमिजनों का आनंद भरा आया समय मानसून, मोर पंख फैलाए धीरे _ धीरे है मचलता, बेहद ही महत्वपूर्ण ऋतु वर्षा आई, सूखे हुए कुएँ , तालाबों तथा नदियों को, फिर से भरने आई है ऋतु वर्षा। पानी के साथ जीवन में अमृत देने, गर्मी से निजात दिलाने आई है वर्षा, किसानों को समृद्धी भरी सौगात देने, फसलों को लहलहाने आई है वर्षा। पानी का वीभत्स कमी दूर करने, कली _ कली को श्रृंगारित करने, मन को मतवाला करने, नई _ नवेली आशा जगाने, छम _ छम नाचते आया है मानसून। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍️
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....