MUKESH KUMAR DHODHAWAT 01 Aug 2025 कविताएँ समाजिक #कविता #मेरा मन कहता है मैने अपने काम को अपना पेशन समझा 18817 0 Hindi :: हिंदी
मेरा मन कहता है मैने अपने काम को अपना पेशन समझा है मेंने महल बनाए अपने मन के ओर अपने सपनों में जीता रहा छोड़ दुनिया दारी को में अपने मन की करता रहा बात भी की तो अपने आप से और इन हवाओं से लड़ता रहा दुनिया ने मुझे जो भी समझा है मेरा मन कहता है मैने अपने काम को अपना पेशन समझा है लाचारी है इस शहर में की लोग मुझे बर्दाश्त नहीं कर सकते बर्बाद तो कर सकते हैं लेकिन आबाद नहीं कर सकते मेरी होठों की एक हसी को उन्होंने व्यंग्य समझा है मेरा मन कहता है मैने अपने काम को अपना पेशन समझा है कड़वा हो गया था अपनो कि नजर में जहां बचपन गुजारा उसी शहर में परवाह नहीं कि मैने अपने समाज की नहीं कि रस्मो रिवाज की मैने अपने जीवन को अकेला समझा है मेरा मन कहता है मैने अपने काम को अपना पेशन समझा है कमाया था बच्चों की हसी की खातिर जीवन गुजारा बनकर शातिर दूर होकर बच्चों से रोया अकेला होकर सपना देख रहा हूं आंगन की किलकारियों को बुलंदियों पर जाने का पर बच्चों ने मुझे क्या समझा है मेरा मन कहता है मैने अपने काम को अपना पेशन समझा है कमल रूपी नयन से मैने सारे परिवार को संवार दिया सारा कमाया मैने उन पे वार दिया ख्वाब टूटे थे जब मेरे अपनो ने मुझे झकझोर दिया दिया वास्ता सच्चाई का ओर गहरी खाई में झोंक दिया मेरे अपनो ने मुझे क्या समझा है मेरा मन कहता है मैने अपने काम को अपना पेशन समझा है मुकेश कुमार धोधावत 7726075950