संदीप कुमार सिंह 23 Jul 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 21080 0 Hindi :: हिंदी
(दोहा छंद) मर्यादा लज्जित हुई,और हुआ तब शोक। धीरे धीरे यह बढ़ा,इसका मिले न रोक।। मर्यादा लज्जित हुई,किया गलत जो काम। इससे हम सब सीख लें,याद करें नित राम।। मर्यादा लज्जित हुई,सीमा है लाचार। चाहे कभी न वह बुरा,उसमें है अति प्यार।। मर्यादा लज्जित हुई,डूब गई जो नाक। जन गण यह सब जानकर, काफी हुए अवाक।। मर्यादा लज्जित हुई,खोई मन की लाज। हैरत में अब सांस है,बदतर है अब आज।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍️ जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....