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प्यास न जाने जात को-मौसम करे न वैर

संदीप कुमार सिंह 09 Jul 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 22679 0 Hindi :: हिंदी

(दोहा छंद)
प्यास न जाने जात को,मौसम करे न वैर।
सब पर एक प्रभाव दे,समझे कभी न गैर।।

मुश्किल जब हो सामने,ढूंढे सभी बचाव।
प्यास न जाने जात को,करे न भेद अलाव।।
(स्वरचित मौलिक)
संदीप कुमार सिंह✍️
जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार

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