संदीप कुमार सिंह 29 Jan 2024 कविताएँ समाजिक दोहा कविता, दिल को जो छू ले ऐसी कविता, ज्ञान वर्धन कविता, दोहा, कुंडलिया, मुक्तक, कहानी, रोला, ग़ज़ल, छंद. 49337 0 Hindi :: हिंदी
समझ सका है कौन यह, होता क्यों तकरार। बात-बात में ही करे,लोग आज के मार।। कोई समझ न यह सके, कलियुग का यह खेल। जलते जन-जन मेल पर,देते कर बेमेल।। मानवता का ह्रास है, मतलब के सब यार। तभी कष्ट भी खूब है,जिन्दा लगे मजार।। अपने दुख पर ध्यान मत,देता वही सलाह। बड़ी हास्य है बात यह, खुद हो के गुमराह।। जो समझे सो ठीक है,मूढ़ करे अभिमान। झेले कर तकलीफ को, याद करे भगवान।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍️ जिला:-समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....