संदीप कुमार सिंह 29 Jul 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 21690 0 Hindi :: हिंदी
(दोहा छंद) शहरी रौनक देखकर,हृदय हुआ गुलजार। आँखों में चाहत बढ़ी,आए भव्य विचार।। शहरी रौनक देखकर,कंगन खनकी कान। तन मन मुग्ध सितार सा,मैं भी हुआ सुजान।। शहरी रौनक देखकर,फैला भव्य प्रकाश। चाहत नूतन भी जगी,छूं लूं अब आकाश।। शहरी रौनक देखकर,होती पगली सोच। लगी ख्वाब जो देखने,जीने में अब लोच।। शहरी रौनक देखकर,महकी तन मन यार। सबकुछ पाना है हमें,रब कर दे उपकार।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍️ जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....