Nihal singh 22 Jan 2026 कविताएँ राजनितिक #कविता #समकालीन_कविता #व्यंग्य_कविता #राजनीतिक_कविता #सत्ता_और_सच #लोकतंत्र #सामाजिक_चिंतन #अभिव्यक्ति_की_आज़ादी #तेज़_व्यंग्य #प्रतिरोध_की_आवाज़ # निहाल 14849 1 5 Hindi :: हिंदी
हमारी ज़िंदगी को ख़ाक और बर्बाद कर दिया, हाँ, ये वही लोग हैं जिन्होंने अपनी नज़र में देश को आबाद कर दिया। बहुत बरसों से चली आ रही थी यहाँ सर्वधर्म-समभाव की रिवाज़, ये वो लोग हैं जिन्होंने इसे बदल दिया। तुमने अभी देखा नहीं है शायद इनका जादू, मैंने तो यहाँ तक सुना है— इन्होंने एक फ़ोन पर ही विश्व युद्ध बंद कर दिए। अरे, किसी ने कह दिया इन्हें फ़िरौन का साथी, ढूँढो ज़रा—कहाँ है वो, ज़िंदा है या उसे भी धर दिया। ज़रा-सी तो ज़बान है, चलते-चलते चलती चली गई। स्व-विकास कहना था, सबका विकास निकल गया। डेढ़ सौ करोड़ में एक ही है जो आसमान से सीधा धरती पर उतरा। फिर अंतरात्मा ने समझाया मुझे— ये देव नहीं, शायद असुर ही है जो इस धरा पर आ गिरा।
2 months ago