शरद भूषण मोंगरा 31 Aug 2026 कविताएँ समाजिक ग़रीबी के धागे 139 0 Hindi :: हिंदी
मैं कोई बड़ा साहित्यकार नहीं, जो हीरे-जवाहरात के बदले चमकते हुए शब्द खरीद लाऊंगा। मैं तो कमज़ोरों लाचारों की पीड़ा महसूस करने वाला छोटा-सा लेखक हूं जो ग़रीबी के धागे से जुड़े टूटे फ़ूटे शब्दों से ही काम चलाऊंगा।