संदीप कुमार सिंह 15 Aug 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 23539 0 Hindi :: हिंदी
(दोहा छंद) वो क्या समझेंगे भला,शब्दों का क्या मोल। रखते गाली होंठ पर,पहने नकली खोल।। वो क्या समझेंगे भला,होता क्या परिवार। जिनका खुद पे बस नहीं,कर लेते तकरार।। वो क्या समझेंगे भला,होता क्या कर्तव्य। करे समय बेकार वह,सोचे कभी न भव्य।। वो क्या समझेंगे भला,होता क्या है प्यार। धोखा फितरत में रखे,पीछे करता वार।। वो क्या समझेंगे भला,कैसे चले समाज। भरे खजाना स्वयं का,समझे खुद को बाज।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍️ जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....