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बढ़ते कदम मुसाफिर
शीर्षक- बढ़ते कदम मुसाफिर! तान ले यदि तीर अपना मंजिल की ओर सोंचकर उम्मीदों पर खरे उतर रहे हम , दुनिया तुम्हारा नाम क्यों याद �
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Talash
Kya Zindagi Tu Kis Talash me hai Pta kr...Tu kahi aas pass hi hai
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आवाज़-ए-शहीद
दुनिया तो वैसे भी छुटी दिल से निकालो मत अभी ज़िंदा हूँ मुझपर रोज़ आकर फूल डालो मत अभी।। मैं मर गया तो ठीक है इतना रहम तो तुम करो मेरी चित�
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कुछ भाव
कुछ भाव सिर्फ़ देकर दिल जीत ले तू मेरा फिर अर्थ धन भला क्यों है सामने बिखेरा।। जो भक्ति दिल से करते , झोली में पुण्य भरते दिल से लगा लूँ �
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ये बातें और रो रो कर नयन से जल बहाया है
ये बातें और रो रो कर नयन से जल बहाया है स्वयं गिर गिर के लोगों को मग़र हमने हँसाया है।। ये रस्ता जा रहा किस ओर हमने पूँछ कर देखा गए कर पा
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बचपन का बंदर
रात को अकेले में ये विचार करता हूँ क्या मैं आज बचपन के उन ही बंदरों सा हूँ।। रोज़ खेलते, कूदते और साथ पिटते थे दूध से बनी रबड़ी पे दो ह�
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अहवान
कई जन्मों का आज संगम करेंगे, विचार और मंथन करेंगे, आर और पार की लड़ाई करेंगें, जीत का बिगुल फुकेंगें। ना कोई हम से टकराना, हम हैं खतरना�
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भूत की प्रेम कहानी। (दो लोगो प्रेम)
एक गांव में दो परिवार रहेते थे।👬 जिनमे बहुत घना मिलाब था। वे एक दूसरे के लिए अपनी जान देने को तैयार रहते थे। उनकी यह घनिष्ठा देख कर लो�
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धूप और छांव
धूप और छांव जिंदगी का हिस्सा हैं, दुःख और सुख जिंदगी के पहलू हैं, हर हाल में जीना,हर परिस्थिति से निकलना हैं,ये ही जीवन जीने की कला हैं।
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लघुकथाःः वर्क एट होम
लघुकथाःः वर्क एट होम साधना वर्क फ्राम होम से निपटी और निढाल होकर बिस्तर पर पड़ गई। तभी उसका दस वर्षीय बेटा कहीं से आया और मैगी की फरमाइ�
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स्वगॆ सी प्यार
न मिला वह कंधा, बैठ दुनिया देखने की। न वह अंगुली, पकड़ गलियां घुमने की। न मिला स्नेह उसका गलतियों में राह दिखाने की । कह गए बिच राह, छो�
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खुद का खुद से ध्यान रख
खुद का खुद से ध्यान रख, ध्यान भी कर, प्यार भी कर। नफरत की गन्दी हरकत दूर कर, यूं ही हसियों और खुशियों में सफर कर। खुवाबो का महल बना, उसे स
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