Pravin Chaubey 01 Mar 2025 शायरी समाजिक #kavita#shayari#poeam 30427 0 Hindi :: हिंदी
ढलती उम्र का हर मंजर नया सा है,
कल जो जवां था, आज तनहा सा है।
आँखों में अब भी ख्वाब जिंदा हैं,
पर पलकों पर बोझ थोड़ा ज्यादा सा है।
कदम जो कभी हवा से बातें करते थे,
अब हर मोड़ पर ठहर जाते हैं।
दिल अब भी धड़कता उसी जोश से,
मगर अब इन सांसों में वो बात कहा है
ढलती उम्र का हर मंजर नया सा है,
- प्रवीण चौबे
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