Pravin Chaubey 14 Feb 2025 शायरी देश-प्रेम #shayari#poitry#kavita# 25700 0 Hindi :: हिंदी
"मिट्टी की सोंधी खुशबू में बसी है ज़िंदगी,
गाँव के उस कुएँ में अब भी बचपन पड़ी है,
शहर की रफ्तार में बहुत कुछ पाया मगर,
जो अपनापन गाँव में था, वो कमी अभी भी खड़ी है।"
"खेतों में लहराती फसलें, वो बैलों की चाल,
गाँव का हर कोना है जैसे कोई खुली किताब,
शहर की भीड़ में खुद को तन्हा पाया है,
पर गाँव की चौपालों में अब भी बसता हिसाब।"
"जब भी गुजरता हूँ किसी मिट्टी के रास्ते से,
गाँव की गलीयाँ फिर से आवाज़ देने लगती हैं,
वो नंगे पाँव दौड़ना, वो आम के पेड़ की छाँव,
यादें दिल में धीरे-धीरे अंगड़ाई लेने लगती हैं।"
- प्रवीण चौबे
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