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एक रिश्ता ही है।
एक रिश्ता ही है। इन्सान की नियत और सच। अकेला भी अपना है, अकेले में भी अपना है। सच निर्दयी भी है। पर इन्सान की नियत का वजूद भी। एक रिश्त�
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सच अभी कहां सामने आऐ।
सच अभी कहां सामने आऐ। जांच भी तो अधूरी है। बात भी तो अधूरी है। कहानी -सी ही शुरू होती है। लेकिन कहीं पर शुरूआत भी अधूरी है। सच अभी कहां �
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"सच को माना है।"
सच अहम जरुरी है। इन्सान का मन-मनका , होना भी अहम जरुरी है। दोस्तों में दोस्त होना , अपने में सौ होना(आत्मनिर्भर), मेरे दोस्त! अहम जरुरी ह
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शुक्रिया करना आसान है
शुक्रिया करना आसान है। लगा जैसे सुनने वाला मेहमान है। यह ठीक ही होता है। बिना वजह शुक्रिया नहीं। करने वाले से नज़र नहीं आती। शुक्रि�
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ख़याल-भर ने सवाल किया है।
ख़याल-भर ने सवाल किया है आने वाले कल का। रह-गुजारे की ज़िन्दगी और नये पेड़ की जड़ का। राम सुन्दर पार्क वन है। बेरहम तो हम हैं। ख़्याल-
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कोई ख़ुशी होती है।
कोई ख़ुशी होती है। अपनों के बीच में ही अपने के होने की शुरुआत। अकेले से मन जाती ख़ुशी। हां,मनाई जाती सब के साथ। कोई ख़ुशी होती है। दि�
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इतफाक से ज़िन्दगी में
इतफाक से ज़िन्दगी में पहलू बने आप। सच से पहले भी सच के बाद। निशान न मिले मुझे वक्त से आज। इतफाक से ज़िन्दगी में पहलू बने आप। नाराज�
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"एक तालिम -अपनापन"
ये कैसी मोहब्बत रही। हम ज़माने के काम करें शायद! बे-हद, सवालों की किताब बने। ये कैसी मोहब्बत रही। सामने परिवार बे-परवाह ज़िन्दगी साथ
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दौलत ही सच्ची है।
उम्मीद से कहता हूं आपको ज़िन्दगी खुदा है। सजाई समझ रहा हूं बस आपको। कर्म -कर्तवय अब भी अपने हैं। झूठे जो बस वो ख़्वाब है। कल से अकेला
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अपनों का प्यार (बेटियां)
हर दिल से, खुदा मांगता हूं। चिरागों से अपनों के पाने की, दुआ मांगता हूं। हर दिल से, खुदा मांगता हूं। करने की जिसने ख्वाहिश थी, मेरे घर
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क्यों ख़्वाब से परेशान हैं?
क्यों ख़्वाब से परेशान है? ज़िन्दगी! मासूम हक़ीक़त ने भी इसके दामन को चिर (काट-फाड) दिया। बहाने के दरमियान ये जो अपनों को खोजती। ज़िन�
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मैं पुराने जमाने की दीवारों को करीब से देखा है
मैं पुराने जमाने की दीवारों को करीब से देखा है बेशक रहते हैं नए जमाने के लोग पर आज भी वह पुराने जमाने की यादों को बखान करती है�
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