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हसरतें अधूरी रही
हसरतें अधूरी रह गई, जिंदगी की दौड़ भाग में। यूं ही उम्र गुजर गई, सही मौके की तलाश में।। - मोहम्मद सईद आलम
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“घर से हौसला”
मिट्टी का चूल्हा कहता है— बेटा, रोज़ जलना पड़ेगा, तभी घर में उजाला आएगा। रोटी बोलती है— पहले खुद पकना सीख, फिर दुनिया को भूख मिटाने क
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ज्ञान का दीप यदि न जलेगा
जिंदगी में रहेगा अंधेरा ज्ञान का दीप यदि न जलेगा न मिटेगी गरीबी मुसीबत हर कोई जब तलक न पढ़ेगा, जिंदगी में रहेगा अंध�
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धुणी
बरसती ठंडी धुंध में आग री ओट, मिनख रो सहारो हुवै। बुढ़िया सिंझ्या खेत सूं आई पाछै, पाळै मांय रोज तपै। बैठक जमती जोरगी चिलम री सट्ट में
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बचपन मुझे याद आता है
बचपन के खेल खिलौने याद आते हैं, बचपन के दोस्त साथी याद आते हैं। बस एक छोटी सी दुनिया थी हमारी, निस्वार्थ बेमतलब थी अपनी यारी। धर्म जा�
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खुद से बातें करना अच्छा लगता है
कभी-कभी खुद से बातें करना अच्छा लगता है, तन्हा राहों पर अकेला चलना अच्छा लगता है। जिंदगी की भाग दौड़ में खुद को इस कदर भूल चुका हूं मैं,
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"उत्थान"
“सुबह तो रोज़ होती है… सूरज हर दिन उगता है… पर सवाल ये नहीं कि दिन कब निकला— सवाल ये है कि इंसान कब जागा? भीड़ में चलना आसान है, पर खुद
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न्याय जो कर्म से आगे देखता है
आज यमलोक में असामान्य चहल-पहल थी। इस हलचल का कारण यमदूतों द्वारा लाई गई दो आत्माएँ थीं—एक माँ और उसकी बेटी। दोनों की आत्माओं से ऐसी उ�
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नभ के राही
नभ के राही तु सुन मुझको ले चल उस पार जहाँ उड़ के तु जाता है लेने प्यार दुलार । नभ ही है वो घर तेरा नभ ही तेरी जान नभ में ही विचरण करें न
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शिकायतें बहुत थी हमें भी
शिकायतें हमें भी बहुत थी अपने रब से, पर माजूर मजलूमों को भी, तेरा शुक्र अदा करते देखा है जब से, शर्मिंदा बहुत हूं मैं अपने रब से, या रब श
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उम्मीद की कश्ती
उम्मीद की कश्ती में सवार, दुनिया के समंदर में निकला हूं मैं। हर तरफ लगा है मेला, फिर भी तन्हा अकेला हूं मैं। परवाह नहीं मुझे, मंजिल म�
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बहाने बहुत हैं
बहाने बहुत हैं अपनी नाकामी छुपाने को, माचिस की एक तीली काफी है पूरा जहां जलाने को, अपने अंदर की चिंगारी को बुझने मत दो यारो, उम्मीद की
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