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पगड़ी को भार, धरती स्यूं भी ज्यादा हुवै। कोई धरती पर रख देवै, कदी रखवाई जावै तो। देखी है जमीन धंसता... - राधेश्याम जोशी कोहिणा read more >>
चालता जद चरड़ चरड़ करती, जाणै बां'रै हाडा स्यूं होड़ करै। टाबरिया नैं बूंटिया दिरा'र खुद, चापू लगवा लेता बोदी खाल रौ। पण हिम्मत री कमी � read more >>
मां आखर सूं मुंह भर ज्यावै, मां नै देख्यां मन हरसावै। मां रौ करज उतर ना पावै, फरज आपणो बढतो जावै। मां धरणी अर मां ही जरणी, पग-पग माथै दुख read more >>
समय बड़ा अनमोल है, इसे यूँ ही न गँवाओ तुम, बर्बाद भी करना हो तो, किसी ख़्वाब पे लुटाओ तुम। सिक्कों में नहीं तौला जाता, दिलों में बसता है � read more >>
आती है तो आने दो, आना उनका काम। कसकर बांँध लो मुट्ठी में, क़दम लहरों के वाम। बन लहरी लहरों को, अपने कर लो नाम। हारा कहलाए बेचारा, चल व read more >>
ख्वाबो की बस्ती का समंदर हूं मै, अपनी उलझन मे उलझा मंजर हूं मै ।। read more >>
मतला: वक़्त के आईने में मेरा सच नज़र आता है, जो मैं बनकर चलता हूँ, वही रूप बन जाता है। हर लम्हा सवाल बनकर रूह से टकराता है, मेरी खामोशी क� read more >>
देश के विकास में आपने बहुत योगदान दिया है। मैं खुद उस शहर से हूं जो आपका संसदीय क्षेत्र हुआ करता है‌। आपका नारा सबका साथ, सबका विकास मुझ read more >>
आज की सुबह दिनेश के लिए नासूर बनकर उगी थी। वह अब भी अपने बिस्तर पर लेटा था। आँखें खुली थीं, पर उनमें उठने का कोई इरादा नहीं था— मानो रात � read more >>
दुनिया ने मुझसे पूछा, तूने क्या कमाया है, मैंने कहा, मेरे दिल ने सुकून पाया है। सोने की चाह में जब चैन को भुलाया है, हर रात ने मुझे मेरे � read more >>
जंगल का राजा भी बन जाता है तमाशा यहाँ, जब अपनी चाल छोड़ दे, दुनिया की भाषा यहाँ। पिंजरे सोने के हों तब भी, घुटती है हर साँस यहाँ, आज़ादी � read more >>
क्या लिखू ! ऐ जिन्दगी तुझ पर तू हुनर नया सिखाती है, बेवजह की इस खामोशी को तू हर लम्हा अजमाती है read more >>
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