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कब तक आजमाएगा?
कब तक आजमाएगा हमें यह सन्ग दिल जमाना, हमें आता है इसे कैसे है झुकाना। अभी बढ़ाना है हमें अपने मेहनत का पैमाना, बेशक इसके लिए क्यों ना प�
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एक दिन हिसाब होगा
मत दुखाओ दिल किसी का, एक दिन हिसाब होगा। बेशक तुम्हारे हाथों में, आज किसी का हिजाब होगा। आज तुम ताकतवर हो, बेशक तुम्हारा यहां निजाम �
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अंधकार
जब आया तू इस दुनियां मे ना अपना था ना गैर कोई। बंधकर फिर इस मोह माया मे तब चेतना कभी फिर सोई नहीं । तिनका -तिनका फिर बना घोंसला
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पतझड़ के बाद
पतझड़ के बाद बहार आता है, रात के बाद दिन आता है। नाकामयाबी से परेशान ना हो बंदे, दौर ए नाकामी के बाद ही, कामयाबी का तूफान आता है।।
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खुदा के दरबार में
खुदा के दरबार में, खड़े होंगे सब साथ में। क्या गरीब ,क्या अमीर, क्या बादशाह ,क्या फकीर। वहां काम ना आएगा, तेरी दौलत ,तेरा रुतबा। तेरे �
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फिर से दिल करता है
फिर से अपनी बिखरी जिंदगी को संवारने का दिल करता है, जो सपने ख्वाहिशें रह गए हैं अधूरे, फिर से उन्हें मुकम्मल करने का दिल करता है। बेशक �
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अटल बिहारी
अटल बिहारी मृत्यु थी… शाश्वत, सत्य, अटल ! सामना करते रहे “अटल” !! जिंदगी, मृत्यु से सदा हारी है ! पर कर्मों से जो जीता वह अटल बिहारी है !! स�
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“माँ-बाप : वो वजन जो महसूस देर से होता है”
ज़िंदगी तब तक हल्की सी लगती है, जब तक हर बोझ माँ-बाप उठाते हैं। हम धूप में भी सुकून ढूँढ लेते हैं, क्योंकि वो अपने हिस्से की छाँव गंवाते
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"किस्मत का कारीगर"
किस्मत कोई ताज नहीं जो बैठे-बैठे मिल जाए, ये तो वो जंग है जो सिर्फ़ लड़ने से ही जीती जाए। ख़यालों की उड़ान बहुतों ने भरी है, पर मंज़िल उस
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"जो समय से लड़ा, वही आगे बढ़ा"
कितनी भी योजनाएँ बना लो तुम, नक़्शे, रास्ते, मंज़िल के सपने— आख़िरी मोहर समय ही लगाता है, बाक़ी सब तो इंसान के अपने-अपने भ्रम हैं। हम स�
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"परिवर्तन"
परिवर्तन प्रकृति का अटल नियम है, यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं—न लोग, न हालात। जो पीछे छूट गया, वो कहानी बन चुका, अब उसकी राख कुरेदना खुद को जल
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क़लम का कावा
तलवार से तीव्र, क़लम की धार। सह्य करवाल की, असह्य क़लम की मार। अंत में क़लम के, नीचे आती तलवार। क़लम की मार से, क़लम ही सकती उभार। क�
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