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रखें सदा विश्वास- खुशियां तब हो पास
करना पड़ता त्याग है, खुशियां तब हो पास। ढूँढे से मिलता नहीं,जल्दी कुछ भी खास।। जल्दी कुछ भी खास,लगन से ही है मिलता। रखें सदा विश्वास,फू
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त्याग रहो आलस्य को-धीरे धीरे हो रहा,ऋतु में खास सुधार
धीरे धीरे हो रहा,ऋतु में खास सुधार। त्याग रहो आलस्य को, हो अनुपम किरदार।। हो अनुपम किरदार,करे संसार प्रसंशा। बढ़ते आगे आप,पूर्ण होगी
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धीरे धीरे हो रहा-अंशुमान अब गर्म
धीरे धीरे हो रहा, अंशुमान अब गर्म। भक्ति भाव में सब रहें,छोड़ें कभी न धर्म।। धीरे धीरे हो रहा,ऋतु में खास सुधार। त्याग रहो आलस्य को, ह�
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अनुपम हो आगाज-लेखन ऐसा कीजिए
लेखन ऐसा कीजिए,अनुपम हो आगाज। करे नाश पाखंड को,लोगों की आवाज।। लोगों की आवाज,करे भारत को आगे। प्यारा अपना देश,रहे दुख गम सब भागे।। जन �
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वक़्त और हालात इन्शान को मजबूर बना देते है
वक़्त और हालात इन्शान को मजबूर बना देते है वर्ना नेकियों की किताब यूं खाली न होती । और तादाते इश्क़ खुदा की इन्तेहा मत पूंछो वर्ना वलि�
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भूखे भेड़िये हैं वो
भूखे भेड़िये हैं वो, खाने भी आयेंगे तुमको पेट जब भर जायेगा दुख जताने भी आयेंगे तुमको दोगला चरित्र है उनका विश्वास मे मत आना उनकी हद स�
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मां ममता परिभाषा बदल गई
पिघल ममता मोम, रम स्वामिभक्ति रगों में घुल गई। निज सुत शोणित से, मां ममता परिभाषा बदल गई। चुटकी भर सैनिक, फ़रेबी फ़ौज से भिड़ गए। यहां
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उम्र और ज़िंदगी का तक़ाज़ा देखो
यह उम्र और- ज़िंदगी का तक़ाज़ा देखो अपनें किनारा- कर लें अपने को, समझा लो उम्र हो गई इससे पहले जो था- वह ज़िंदगी गुज़ार ली तुमने सि
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खुशबू बिखेर दूं दिले जहां में
तमन्ना-ए-दिल थी- खुशबू बिखेर दूं दिले जहां में मेरे पवित्र- प्रेम का हल्ला मचा दिया, कुछ खास हैं जो अपनों में दिल- तोड़े टुकड़े भी जल�
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एक बीज को- इंतजार है धरती का
एक बीज को- इंतजार है धरती का, पानी का-सूरज की गर्मी का और ऋतु का- फिर अपने आप, जीवन पनपने को आतुर है जीवन- का तत्व जो बीच के अंदर है, यह ज
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बैर- कूट और हिंसा छाई पूरे जहान में
कैसी ये दुनिया बनाली देखो इंसान ने, बैरकुट् और हिंसा छाई पूरे जहान में। दौलत के खातिर देखो लड़ते परिवार में, बैर-कूट और हिंसा छाई पूर�
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स्त्री-स्त्री बनकर जीना आसान नहीं
स्त्री... यह छोटा सा शब्द है, मगर स्त्री बनकर जीना आसान नहीं। स्त्री तो होती हैं धरती कैसे? जी हाँ, स्त्री तो बिल्कुल धरती समान हैं। स्त
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