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शक्ति है तेरा नाम
शक्ति जो है तेरा नाम ,रखना तुम इसका सम्मान, लक्ष्मण रेखा से बाहर ना आना अंदर जो आए काली बन लहू भी जाना।
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हिंदी-वाणी में मधुरता
वाणी में मधुरता हिंदी में, संस्कार सभी है हिंदी में... दुश्मन को धूल चटा दे, वह ललकार बसी है हिंदी में... मृत देही में जान फूंक दे, वह उ�
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मैं क्या तुझे डर जाऊंगा
तू क्या समझा ऐ व्यभिचारी मैं क्या तुझे डर जाऊंगा शांत हृदय सा था मैं बैठा तूने ही हुंकार लगाया क्रोध की चिंगारी बिखराकर तूने दिल मे�
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झुग्गी-झुग्गी झोपड़ के तरकश में
कहीं सड़क पर कहीं वीराने अलिशान भवन बनवाया जिसको पत्तल से ढककर के कपड़े का दरवाजा लगवाया एक नही सौ दो सौ होंगे ऊंचे बंगले वाले जन छ�
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एक काम की तलाश में
खाना बंद लिए उन हाथों में दिन के उजाले जग चुके हैं एक भीड़ है जो तरस रही है एक काम की तलाश में वो काम को पाल सकता है उन नन्हे नन्हे कोप�
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ज्ञान का उचित प्रकाश
मैं तो था अज्ञानी बालक अंधकार से मुझे बचाया ज्ञान का उचित प्रकाश दिखाकर संस्कार की राह दिखाया ज्ञान और अनुशासन से हमको इतना सफल बन�
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काले मेघ घटा पर छाए
कड़क कड़क यूं उमड़ घुमड़ के काले मेघ घटा पर छाए चमक चमक के गरज गरज के चपला ने है राग सजाए छाया है एक चद्दर सा सूरज की लाली घेर लिए है �
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प्रकृति के हाथों में है
नियंत्रण! चहता है, नियंत्रण पृथ्वी- जल-अग्नि-वायु आकाश जन-जीवन पर मानव सदियों से और खुद नियंत्रित- होता वक्त के हाथों में समस्त- ब�
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मेरी गांव की यादें
याद आती है मुझे, कभी-कभी गाँव में गुजरे पल। गोधूलि के वक्त, कच्ची सड़कों पर साईकल के बेकार पहियों को घुमाना। बूढ़े पीपल के वृक्ष के नीचे,
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आज की यह दुनिया
आज की यह दुनिया इस दुनिया में ना कोई अपना है ना ही कोई पराया। हर किसी का आज की दुनिया में स्वार्थ भरा है रहते हैं सब मिलजुल कर सामने और अ�
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धारण योग्य जो धर्म वही है
कविता -धारण योग्य जो,धर्म वही है सत्य मार्ग पर आगे बढ़कर मानवता के पथ पर चलकर शान्ति और सहयोग बनाकर जाति पाति का रोग मिटाकर छूआ छूत
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मां क्यों छोड़ गयी
मां छोड़ गयी क्यों? मां छोड़ गयी क्यों आज मुझे हो गया हूं तेरे बिन अनाथ अब कौन मुझे समझाएगा किसका पकड़ चलूं मैं हाथ। ना भूल सका मैं आ�
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