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दलाली का स्तर कितना ऊंचा है
तुम देते हो गाली तुर्कों को लेकिन जिक्र तक नही करते अंग्रेजों का,अपनी किताबों मे और तो और तुम्हारी वाट्सएप युनिवर्सिटी मे मुगलों की
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शबनम -मोती
यौवन युक्त विभावरी, श्रृंगार करे रजनी रानी। जूड़ा खोले, केश सुखाए, छिड़क गया अमृतपानी। अल्हड़ बूंद नादान- सी, धरती पहुंच इतराती। चमचम
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शिक्षा की पहुंच
जाज्वल्यमान मणि, चमचम चमक रही है। दृष्टिवंत क़िस्म, मणिमय दमक रही है। तीक्ष्ण रश्मि अंतरायण, वहीं सिमट रही है। रश्मि से रश्मि, बेमन ल�
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तपिश
तपिश शब्द गर्मी की पराकाष्ठा को हमारे मानस पटल पर चित्रित करने के लिए पर्याप्त है। भारतवर्ष में तपिश अप्रैल से जुलाई तक अपने उग्र रूप
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शीर्षक (जिन्दगी और मौत)
शीर्षक जिन्दगी और मौत मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) मौत तो यूँ ही बदनाम हैं। लोग तो जिन्दगी से परेशान हैं। जिन्दगी हर रोज़ लाती एक नय
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विश्वास
हम भले ही किसी को ध्येय की दृष्टि से देखे, उस पर विश्वास करे या ना करे हम भले ही यह कहे की ये दुनियां विश्वास के काविल नही�
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अग्नि कुंड में
बस तुम्हे जलना होगा तपति अंगार पे चलना होगा देना होगा अग्नि परीक्षा फिर से तुम्हे सहना होगा क्या स्त्री ही वार वार सत्यता का परिच�
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मेरी माँ के आँगन से,ये शहर छोटा लगता है
मेरी माँ के आँगन से , ये शहर छोटा लगता है। मेरी माँ के दीपक से, ये सूरज फीका लगता है।। हम लाख कमा ले दुनिया में ,मनचाही दौलत। पर माँ के �
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समाज
ये समाज एक तेज तलवार है इसमें जीत भी हार है। इंसानियत तो अब कही है ही नहीं हर तरफ बस लोगों में तकरार है ये लोग जो हैं बड़े होते बेरहम ह�
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पहुंच
चांद तू क्या था, क्या हो गया? भारी- भरकम पेड़, बुढ़िया सरसर सूत कातती। बैठी बूढ़ी आंखों से, जवां जहां को ताकती। बच्चों को बहलाती मां, चा�
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जीवन- संध्या
सही- गलत, गर्हित , सहल हो लिए साथ। मूसलधार हो रही, छल-छंद की बरसात। कठिनाइयां कह रही, तू डाल मैं पात। अवसर तुझसे कह रहे, नाप तेरी औक़ात। छ�
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उन अँधेरों का उड़ना
उन अँधेरों का उड़ना सक्त मना हे जो दीवों मे जलकर भुना हे / उन गलियों में अँधेरों का गुजरना सक्त मना हे जो अन्ध बनके चला हे/
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