हो कोई भगीरथ, जो गंगा को धरा पर ला सके।
दीन- हीन शोषित नर जिसकी, निर्मल धारा में नहा सके।
भ्रष्टाचार के पेड़ को, जो नष्ट कर दे जड़ सहित।
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// सुप्रभात ...
सुबह हो गई ,
चल बेटा उठ ...!
उठ बेटा उठ ,
बहुत गया सुत ...!
जो सोया ,
वो खोया ...!
जो जागा ,
वो पाया ...!
समझ में तेरे ,
तुझे...आया कुछ ...!
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