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सामाजिक छल - F-58 हूँ धन से गरीब, नहीं अन्न से गरीब, ना दिल से गरीब, गरीबी मेरी का यूं मजाक ना कर II हूँ हक हलाल का मालिक, दिल से जिया, खरी read more >>
हम अभ्यस्त हुए -59 शक्ति महिला, अरमान, फरमान, कर्ज दान ईमान सब त्रस्त हुए, रीत पुरानी, कुरीत जनानी, करें मन मानी, हम अस्त - व्यस्त हुए, चलत� read more >>
चलते चलते बात हुई, अधूरी नई वार्तालाप हुई, घर परिवार मिल कुछ बात हुई, व्यस्तता चलते आधी रात हुई, फिर भी कहाँ पूरी बात हुई ? चाहत मिलना ब� read more >>
आज दिवाली है-आज दिवाली है, चारों और दीये ही दीये जलेंगे। काली रात भी आज जगमगायेगी, खुद पे बहुत ही इतरायेगी। दीपों की मनोहर शृंखला ल� read more >>
पग-पग आज दिवाली है हर ड्योढ़ी पर कलश सजे हैं द्वार-द्वार नव दीप जले हैं उतर गया है चाँद धरा पर यह रात बड़ी मतवाली है । पग-पग आज दिवाली है read more >>
मेरे लिखने से क्या तुम पढ़ो तो कोई बात बने.. मेरे सोचने से क्या तुम समझो तो कोई बात बने... मेरे चाहने से क्या तुम एहसास करो तो कोई बात बने. read more >>
#विधा:_मुक्तक छंद #मात्रा भार:_22(11मात्रा पर यति) #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" लालच जो मैं किया, बुरा हुआ तब हाल। छूटा सब दोस्त है,गड़बड़ है read more >>
#विधा:_मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" रहिए सदा उदार मन, करिए कभी न लोभ। खुशियों की बरसात हो, दूर रहे तब छोभ। सपने सब मंसूब हो,फै� read more >>
#विधा:_दोहा मुक्तक छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" एक परिवार में सभी,हुए अजब लाचार। सब सब को ही चाहते,करते दिल से प्यार। खाते कसकर खूब � read more >>
आने से उसके छा गई एक नशा, हवा भी चली कुछ अंगड़ाई लेते हूए। मन में भी हलचल हुई कुछ अजीब सा, आँखों में वही चेहरा जम गई काजल सा। धीरे-ध� read more >>
अकबर राजा देश के सबसे बड़े राजा थे। जितना बड़ा उनका महल था उतने ही उनके दरबार में दरबारी भी थे। इन दरबारियों में हर तरह के बुद्धिजीवी, क read more >>
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" समझो जीवन अर्थ को,हमें मिला वरदान। जगत सजा संगीत से,बनिए सदा सुजान।। समझो जीवन अर्थ को,रहे read more >>
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