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कविताएँ
मानवता एक दूसरे की मन में भर दो-रौशन हिंदुस्तान को कर दो
छोड़ो भेदभाव मिटाओ अब दुरी💯 क्यों लड़ते हो आपस में क्या लड़ना है 💐जरुरी उखाड़ फेंको बुनियाद नफरत की गले ल🥀गाओ एक दूजे को मोहब्बत र�
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जीवनधारा-जीवन के हर पड़ाव में सबको ढलना पड़ेगा
जीवनधारा हुआ सवेरा तो यह सोचा कि आज तो कुछ नया करेंगे यह ख्याल न था कि अभी तो मैं इस सृष्टि में आया नहीं कुछ दीपक दिन में जलते हैं कु
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आधा है सब जीवन-जिस पर अधिकार तुम्हारा
जलाना तुम क्यों सीखे हो अभिलाषाएं सो जाएंगी हे प्राण से तुम आ जाओ जीवन इच्छा मर जाएगी। मेरे तम से ही मूक हुई जिस पर अधिकार तुम्हारा �
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तुझ्या सौंदर्याचं कौतुक मी माझ्या शब्दात मांडेल
लिहिलं तर लिहितांना सांगेल , तुझ्या सौंदर्याचं कौतुक मी माझ्या शब्दात मांडेल. असच नाही तुला बघुन फुल पण लाजली जातात, माझ्या हातून तु�
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राष्ट्र प्रेम- भारत माँ के लिए समर्पित
सबके हृदय में बसे हैं जो वीरता के धागे, प्यार और सम्मान से जुड़े, जिनके सपने न्यारे। उन वीरों का रक्त, जो भूमि के लिए बहा, मां भारती के ल�
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मर्यादा लज्जित हुई-और हुआ तब शोक
(दोहा छंद) मर्यादा लज्जित हुई,और हुआ तब शोक। धीरे धीरे यह बढ़ा,इसका मिले न रोक।। मर्यादा लज्जित हुई,किया गलत जो काम। इससे हम सब सीख ले�
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किस पथ पर खोलूं नैन-भटक रहा जिस तृष्णा में मन
कहां चलूं,कब छूटे रैन भटक रहा जिस तृष्णा में मन किस पथ पर खोलूं नैन। घोर पाप में डूबा है सृष्टि का तन अटल सत्य से भाग रहा है फिर भी मन।
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माता पिता- जन्म दिया माता ने तुमको पिता ने तुमको प्यार दिया है
*माता -पिता* जन्म दिया माता ने तुमको उसका तुम सम्मान करो पिता ने तुमको प्यार दिया है उसका तुम अभिमान करो ।। माता ने पाला है तुमको पित�
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अकेला मन-न किसी से प्रीत हैन किसी से नफरत
कि वह रहता है वह कैसा अकेला मन इस जगत में । रोज एक ही कार्य मे वह ऊबता होगा इस जगत में । कैसे रहता ह�
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अकेला मन-न किसी से प्रीत हैन किसी से नफरत
कि वह रहता है वह कैसा अकेला मन इस जगत में । रोज एक ही कार्य मे वह ऊबता होगा इस जगत में । कैसे रहता ह�
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यूँ मत कहना सब बाते- उनके हदय को न भाती हो
कि कहना बहुत सरल है पर मन के भावो को समझो । क्या पीड़ा होगी उनके उर में यह पीड़ा अनुभव कर समझो । बहु�
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आसमान के ऊँचाइयों में खोज- सपनों का सफर
आसमान, अनंत विस्तार का अद्भुत क्षेत्र, नव रंगों का सौंदर्य, नये सपनों का आकार। विस्तृत अच्छाईयों से भरा हुआ आकाश, देता है जगत को प्रेर�
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