अक्सर मैं दु:खी हो जाती हूँ ,
जब किसी दूसरी औरत को,
देखकर तुम्हारी आंखें विस्तृत,
हो जाया करतीं हैं तब....!
या फिर मेरी पीठ पर गढ़तीं हैं ,
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तुम खुश हो,
या दुखी,
मुझे नहीं मालुम,
क्योंकि
कई जमाने से,
तुम से नहीं मिला...
परन्तु मैं,
मैं हमेशा,
तुम खुश होगी,
यही मिथ्या
सोच कर,
रो� read more >>
(मुक्तक छंद)
घर के रहे न घाट के, थोड़ा अब तो सोच।
चलें सँभल कर अब जरा,रहे नहीं संकोच।
मैया नैया पार कर,जीवन कर गुलजार_
बढ़े बुद्धि में तेज read more >>
(दोहा छंद)
हार जीत के दाव में, फसा जगत के लोग।
मन से अथक प्रयास कर,पाते सुख का भोग।
जीत सुनिश्चित कर चलें,रखें सत्य का ज्ञान_
खुशियों से � read more >>