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कविताएँ
धरा वसन्ती हो गई-घर घर में है हर्ष
कुंडलिया छंद पूजा मय आँगन लगे,प्राण करे उत्कर्ष। धरा वसन्ती हो गई,घर घर में है हर्ष।। घर घर में है हर्ष,कृपा माँ धनदा करिए। सबको हो उल�
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ईश्वर के आधीन सब-उनसे ही संसार
कुंडलिया छंद माया छाया से भरी, करते रहें पुकार। ईश्वर के आधीन सब,उनसे ही संसार।। उनसे ही संसार,करे सबका वे पालन। अदभुत अनुपम कांड,भव्
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भूलकर पिछली कटुता-सबसे बढ़ा लगाव
कुंडलिया छंद होली की अति है खुशी,भागा अशुभ दुराव। उपजा मन अनुराग से,सबसे बढ़ा लगाव।। सबसे बढ़ा लगाव,भूल कर पिछली कटुता। संगी दुश्मन �
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आँसू आँखों में लिए-रखे जिया में लाज
कुंडलिया छंद आँसू आँखों में लिए, रखे जिया में लाज। पिया संग डोली चढ़ी, कोमल काया आज।। कोमल काया आज,लिए मन में मधु सपने। मंजुल चंचल हूर,
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मानवता से प्यार हो-करूं नहीं तकरार
कुंडलिया छंद मजहब की दीवार को,तोड़ बढूं मैं यार। मानवता से प्यार हो,करूं नहीं तकरार।। करूं नहीं तकरार, मनुज बनकर है रहना। रिश्ते हो म
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महिमा तेरी खूब है-जाने सब संसार
कुंडलिया छंद महिमा तेरी खूब है,जाने सब संसार। माँ तेरे उपकार से, जीवन में है प्यार।। जीवन में है प्यार,नूर आँखों में रहता। माँ तुमसे �
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आया मन आनंद में-खुद पर अब है नाज
कुंडलिया छंद आया मन आनंद में,खुद पर अब है नाज। बिन मौसम बरसात से, रसिया हुआ मिजाज।। रसिया हुआ मिजाज,हुआ फूलों सा जनता। सुरभित हुआ समा�
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कितने घातक हो गए-लगा रखें हैं खोल
कुंडलिया छंद दुविधा में रहते सभी, करते रहते मोल। कितने घातक हो गए,लगा रखें हैं खोल।। लगा रखें हैं खोल,बने फिरते हैं नेता। करते हैं गु�
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एक अनजान नेह-बाँध रखता है सबको
कुंडलिया छंद देता जो है ताजगी,सुन्दर रखता देह। तेरे मेरे बीच में,एक अनजान नेह।। एक अनजान नेह,बाँध रखता है सबको। धरा लगे तब स्वर्ग,कभी
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उपजा मन अनुराग से-सबसे बढ़ा लगाव
कुंडलिया छंद होली की अति है खुशी,भागा अशुभ दुराव। उपजा मन अनुराग से,सबसे बढ़ा लगाव।। सबसे बढ़ा लगाव,भूल कर पिछली कटुता। संगी दुश्मन �
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भाग्य का हुआ सवेरा-कर्म करूं कमनीय
कुंडलिया छंद दोहा में परिचय लिखें, बहुत खूब यह काम। सरल नाम संदीप है, रहूं देवड़ा गाम।। रहूं देवड़ा गाम,धर्म ही पूजा मेरा। कर्म करूं �
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शिक्षा का सम्मान कर-देंगें दृढ़ परिणाम
कुंडलिया छंद शिक्षा का सम्मान कर, देंगें दृढ़ परिणाम। करें देश को सबल सब, होत जगत में नाम।। होत जगत में नाम,सदा गौरव में भारत। घर घर शि
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