उम्र की सीमा नहीं ,है ,किस पार जाना,।
कविता कहती है,सफर वहाँ तय हो,
सन्नाटा रहित पनघट जिधर हो,।
तब कहीं छलके भी तो ,यह आंखों का नीर ,
व्यर्थ read more >>
हां, ज़माना बदल रहा है।
यह,समाज को छल रहा है।
बच्चे, दादा-दादी के, सानिध्य में रहते थे।
एक था राजा, एक थी रानी, किस्से सुनते थे।
बहन, बेटी � read more >>
ये लाइन आजकल के कवियों के लिए
की कवियों के इस मेले में ,न जाने कितने झमेले हैं,।
मैं,लिखती हूँ ,मिटाती हूँ,।मगर ,इक बात पे आती हूँ,।
वाहवा� read more >>