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शीर्षक (सूरज)
शीर्षक (सूरज) मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर) रोज सवेरे आते हो। हमको रोज जागते हो। नया सवेरा लाते हो। आलस्य दूर भगाते हो। ऊर्जा से भर ज�
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आप
ख्यालों में आप सपनों में आप ख्वाबों में आप आप ही आप रहते हो मेरे दिल में आप हर ग़म को भुलाते हो आप हर पल हंसाते हो आप क्यों हो अच्छे इ�
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कबाड़िया
कविता- कबाड़िया ज्ञान गंगा में डुबकी नहीं लगाया, मैं बेबस,लाचार,निरक्षर,अनाड़ी। पढ़ता जिस पुस्तक के पन्नों को, गलियों में बटोर रहा ह
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युगारब्ध
कविता- युगारब्ध बीत गया आने वाला साल, नव युगादि का हो रहा उदय। शीतल होंगे शशि की किरणें, भू पर होगा सुकुमार सूर्योदय।। नाच उठेगी शकु�
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पलाश के फूल
कविता- पलाश के फूल बसंत ऋतु में खिल गया ब्रह्मावृक्ष, लाल,सफेद और पीले रंग के फूल। खेतों के मेढ़ में जंगल की आग जैसे, अर्धचंद्राकार,छो
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प्रेमिका गौरैया
कविता- प्रेमिका गौरैया फुदक-फुदक कर चलती हो, मानो चलती हो विश्व सुंदरी। उन्मुक्त गगन में उड़ती हो, जानु कोई परी,अप्सरा स्त्री।। सरस
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रंगों की होली
कविता- रंगों की होली आ तुझे प्रेम रंग में रंग दूं मेरी राधा डालूंगा रंग कभी थोड़ा कभी ज्यादा गोकुल की गलियों में धूम मची है नव गीतों
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अब करो तैयारी जीत की
कविता- अब करो तैयारी जीत की सोते हुए जन अब जाग जा, तुम छोड़ दो राहें प्रीत की। आ गया है परीक्षा की घड़ी, अब करो तैयारी जीत की।। याद कर प�
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चक्कर
चक्कर है साहब, पड़ ही जाता है। राई का बन जाता पहाड़, गढ़ी बन जाता है गढ़। पाठा का नाटा बन जाता, पहाड़ का बने कंकड़। मकड़ी फंसती मकड़ -जाल,
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जयति मां दुर्गा भवानी
कविता- जयति मां दुर्गा भवानी जयति मां दुर्गा भवानी, अष्ट बाहु सहस्त्र रूप धारिणी। रोग,शोक, पाप नाशिनी, असुर महिषासुर संहारणी।। काल,अ�
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श्रीराम
कविता- श्रीराम हे!रामचंद्र अयोध्या भूपति, पतित-पावन, दीन दयालु। वैदेही वल्लभ विश्व व्यापी, मर्यादा पुरुषोत्तम कृपालु।। नीति नियम
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वर्धमान
कविता का शीर्षक- वर्धमान संसारिक माया से विरक्त हुए अतिवीर। राज वैभव त्याग किया राजपुत्र वीर।। कठिन तपस्या से हासिल किया ज्ञान। सन
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