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स्वछंद आसमां ए कलम कुछ लिख दे ऐसा जो मानव को सबक सिखाये धरती को तो बाँट लिया है आसमां ही बच जाए मानव की तो मति बड़ी है भव क� read more >>
कविता -विश्वास पत्थर तो पत्थर दिल सा मुलायम कहां! किन्तु! पत्थर दिल भी मुलायम होता वहां तो! बेजान कठोर कर्कश ठोकरें देने वाले पत्थर read more >>
कविता -विश्वास और भरोसा पहाड़ों के बीच टेढ़ी मेढ़ी रस्ते पर बस चल रही थी जीवन की रेखा सी रस्ते पर ऊपर नीचे चढ़ रही थी सीधे रस्ते पर च� read more >>
कविता -काले बादल मौसम बरसात की चांदनी रात थी चमकते तारों में सजी धजी चांद की क्या बात थी, देख रहा था मैं उसे उसके चमकते शान को गरिमा औ read more >>
बक्त बे रहम जित गया हार गई फिर जिंदगी काल रूपी पिशाचनी ने छीन ली मेरी हर ख़ुशी पहले भावनाएँ अब छीन लिया जज्बात भी इस जिस्म का मैं क्य� read more >>
तू हवा के झोका बन छू बदन चला जाता मैं टक टकी लगाए देखता रहा तू सब उडा ले गया मेरी यादें कुछ वादे कसमे रस्मे तो उलझे सुलझे अजनबी जज� read more >>
तुमने मुझे..खो दिया... ठीक वैसे ही..जैसे 'बसंत' में 'पेड़'..खो देता हैं 'पत्तों' का साथ... या वैसे..जैसे रह जाता है.. एक 'बूंद' तन्हा...'शाखों' पर 'ब� read more >>
हर बार ये दिल तुझसे हार जाता है, समझाऊ कितना भी न ये समझना जनता है तेरी जो लगी लग गई है, ना ये तुझे भूलना चाहता है बेकरारी दिल की बढ़ जाती read more >>
घर से निकले तो कुछ लोग मिले कोई गली मिली एक शहर मिला बुझा हुआ उनसे मिले तो ये अहसास हुआ सब लोग अंदर से मरे हुए शहर मिला बुझा हुआ जहा ल� read more >>
आसूं की कदर ना तुझे मेरी शिकायत हम भी न करेंगे आज मुझे रूला के जा रहा है कल तुझे कोई रुलाएगा तो याद आएगी मेरी उस वक़्त मुझे ना याद करना read more >>
चल लौट चले फिर बचपन में, वापस उन्ही पुराने पलों में गुड्डे गुड़ियों वाले दिनों में छोड़ कर दुनिया की परवाह चल अपनी ही धुन में मस्त हो � read more >>
घर में पिताजी हैं, तो नौकर के पैसे बचते हैं। सब्ज़ी खरीदने, बच्चों को स्कूल लाने, ले जाने में जचते हैं। पिताजी घर में, नौकर नहीं, तो क्या read more >>
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